संस्कृत नाट्य परंपरा में नाट्यशास्त्र की भूमिका: एक आलोचनात्मक विवेचन
DOI:
https://doi.org/10.56614/m4mddx16Keywords:
संस्कृत नाटक, नाट्यशास्त्र, रस सिद्धांत, अभिनय, रंगमंचAbstract
संस्कृत नाट्य परंपरा भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक अत्यंत समृद्ध और सुव्यवस्थित परंपरा है, जिसके केन्द्र में भरतमुनि कृत नाट्यशास्त्र स्थित है। यह ग्रंथ केवल नाटक के तकनीकी पक्षों तक सीमित न रहकर भारतीय कला-दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, समाज-बोध और धर्म-दृष्टि का समन्वित प्रतिपादन करता है। प्रस्तुत समीक्षात्मक लेख का उद्देश्य यह विवेचना करना है कि संस्कृत नाट्य परंपरा के विकास, संरचना, विषय-विन्यास, अभिनय पद्धति तथा सौंदर्यबोध में नाट्यशास्त्र की भूमिका किस प्रकार मूलाधार के रूप में स्थापित होती है। साथ ही इस लेख में यह भी विश्लेषित किया गया है कि कालांतर में संस्कृत नाटककारों—भास, कालिदास, शूद्रक, भवभूति आदि—ने नाट्यशास्त्रीय सिद्धांतों को किस रूप में आत्मसात, रूपांतरित अथवा संशोधित किया। आलोचनात्मक दृष्टि से यह अध्ययन परंपरा और प्रयोग, शास्त्र और सर्जना के अंतर्संबंध को रेखांकित करता है।
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Copyright (c) 2024 हिन्द खोज: अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका (HIND KHOJ: Antarrashtriya Hindi Patrika), ISSN: 3048-9873

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