शरद सिंह की बुंदेली लोक कथाओं में पर्यावरण
DOI:
https://doi.org/10.56614/1mbcrn04Keywords:
बुंदेली लोककथा, पर्यावरण चेतना, शरद सिंह,पारिस्थितिकी संतुलन, लोक संस्कृति।Abstract
लोक साहित्य किसी भी समाज का जीता जागता रूप होता है, जिस पर उसकी संस्कृति और उसके जीवन के सजीव चित्र होते हैं। जो मानव जीवन की उपस्थित को उजागर करते है। बुंदेलखंड जहां अपनी वीरता और परंपराओं को उजागर करता है, वही बुंदेलखंड के जन जीवन में प्रकृति का स्थान सर्वाधिक रूप से रहा है, वहां के वन, पशु- पक्षी, जलाशय आदि का विशेष महत्व है। बुंदेलखंड में रची बच्ची यहां की मिट्टी और संस्कारों से परिचित बुंदेली साहित्य की प्रख्यात रचनाकार डॉ. शरद सिंह ने अपनी पुस्तक बुंदेली लोककथाएं में लोक कथाओं के माध्यम से इस अंचल की मिट्टी, जल, जंगल और जीव जगत के साथ मनुष्य के आदिम और आत्मीय संबंधों को बड़ी कुशलता से उकेरा है। शरद सिंह का साहित्य ‘लोक-ज्ञान’ को पुनर्जीवित करता है।
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Copyright (c) 2026 हिन्द खोज: अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी पत्रिका (HIND KHOJ: Antarrashtriya Hindi Patrika), ISSN: 3048-9873

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